
सिनिओरेज (seigniorage) कई बार हम यह शब्द RB I (Reserve Bank Of India) की खबरों या सरकार की financial news या RBI की तरफ से सुनने को मिलता है।
आइये समझते है इस आर्थिक शब्दावली का अर्थ क्या होता है।
सरकार व केंद्रीय बैंकों को नोटों और सिक्कों की ढलाई से जो लाभ प्राप्त होता है उसे सीनिओरेज कहते हैं क्योंकि सिक्कों की ढलाई व नोटों की छपाई की लागत की तुलना में बाजार का मूल्य उससे अधिक होता है इसलिए इन दोनों के अंतर से जो आय प्राप्त होती है उसे सिनिओरेज कहते हैं।
उदाहरण के लिए- एक 500 सौ का नोट छापने की लागत ₹3 आती है जबकि बाजार में उसकी फेस वैल्यू ₹500 है। ऐसे में हमारे रिजर्व बैंक को 497 रुपए का लाभ होता है जिसे हम seigniorage कहते हैं इसी तरह एक 2000 का नोट छापने की लागत ₹4 आती है
जबकि बाजार में इसकी फेस वैल्यू ₹2000 है ऐसे में हमारे केंद्रीय बैंक यानी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया को ₹1996 का लाभ होता है।यह सिनिओरेज कहलाता है। इसी तरह सीनिओरेज करेंसी की लागत व बाजार के मूल्य के बीच का अंतर है अगर सिनिओरेज सकारात्मक होता है
तो केंद्रीय बैंक को लाभ होता है यदि सिनिओरेज नकारात्मक होता है तो केंद्रीय बैंक को नुकसान होता है मसलन सिक्कों में एक रुपए के सिक्के को डालने की लागत 1 रुपए 11 पैसे आती है जिससे सिनिओरेज नकारात्मक होता है
इसलिए सिक्कों की ढलाई पर seigniorage ज्यादातर नकारात्मक ही होता है असल में नोटों की छपाई व सिक्कों की ढलाई उसके उपयोग में होने वाले मटेरियल आश्रम लागत पर निर्भर करती है इसी कारण लागत में उतार चढ़ाव होते रहते हैं
क्योंकि पुराने समय में सिक्कों की ढलाई कीमती धातुओं से होती थी। इसलिए इनकी लागत हमेशा महंगी होती थी। हालांकि पिछली सदी के चौथे दशक में कीमती धातुओं से बनी करेंसी को बंद कर दिया गया और कई देशों ने उसकी जगह कागज की बनी करेंसी को अपनाया जिससे उसकी लागत बहुत ही कम हो गई।
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हमारे देश में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) करेंसी को जारी करता है करंसी को छापने वाली चार प्रिंटिंग प्रेस है जिसमें से दो सिक्योरिटी प्रिंटिंग एंड मीटिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के अधीन है और दो रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड के नियंत्रण में है।
बहरहाल रिजर्व बैंक को सीवरेज के रूप में जो लाभ प्राप्त होता है उसे वह सरकार को डिविडेंट के रूप में हस्तांतरण करता है यह राशि सरकार का खजाना भरने के लिए काम करती है।
नोट बंदी के साल में रिजर्व बैंक को 500 और 1000 के पुराने नोटों को वापस लेकर उसकी जगह सिस्टम में नए नोट डालने पड़े जिसके कारण उस साल रिजर्व बैंक को सीवरेज के रूप में होने वाले लाभ में कमी आई थी।
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